श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.25.22

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

मय्यनन्येन भावेन भक्तिं कुर्वन्ति ये दृढाम्।

मत्कृते त्यक्तकर्माणस्त्यक्तस्वजनबान्धवाः॥ २२

mayyananyena bhāvena bhaktiṃ kurvanti ye dṛḍhām|

matkṛte tyaktakarmāṇastyaktasvajanabāndhavāḥ|| 22

अर्थ

जो लोग सहनशील, दयालु, समस्त देहधारियोंके अकारण हितू, किसीके प्रति भी शत्रुभाव न रखनेवाले, शान्त, सरलस्वभाव और सत्पुरुषोंका सम्मान करनेवाले होते हैं, जो मुझमें अनन्यभावसे सुदृढ़ प्रेम करते हैं, मेरे लिये सम्पूर्ण कर्म तथा अपने सगे-सम्बन्धियोंको भी त्याग देते हैं, और मेरे परायण रहकर मेरी पवित्र कथाओंका श्रवण, कीर्तन करते हैं तथा मुझमें ही चित्त लगाये रहते हैं—उन भक्तोंको संसारके तरह-तरहके ताप कोई कष्ट नहीं पहुँचाते हैं॥ २१—२३॥

यह अर्थ श्लोक 21–23 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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