श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.25.18

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

ज्ञानवैराग्ययुक्तेन भक्तियुक्तेन चात्मना।

परिपश्यत्युदासीनं प्रकृतिं च हतौजसम्॥ १८

jñānavairāgyayuktena bhaktiyuktena cātmanā|

paripaśyatyudāsīnaṃ prakṛtiṃ ca hataujasam|| 18

अर्थ

तब जीव अपने ज्ञान-वैराग्य और भक्तिसे युक्त हृदयसे आत्माको प्रकृतिसे परे, एकमात्र (अद्वितीय), भेदरहित, स्वयंप्रकाश, सूक्ष्म, अखण्ड और उदासीन (सुख-दुःखशून्य) देखता है तथा प्रकृतिको शक्तिहीन अनुभव करता है॥ १७-१८॥ योगियोंके लिये भगवत्प्राप्तिके निमित्त सर्वात्मा श्रीहरिके प्रति की हुई भक्तिके समान और कोई मंगलमय मार्ग नहीं है॥ १९॥ विवेकीजन संग या आसक्तिको ही आत्माका अच्छेद्य बन्धन मानते हैं; किन्तु वही संग या आसक्ति जब संतों—महापुरुषोंके प्रति हो जाती है तो मोक्षका खुला द्वार बन जाती है॥ २०॥

यह व्याख्या श्लोक 3.25.17 से 3.25.20 तककी एक साथ है।

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