श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.24.15

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

अतस्त्वमृषिमुख्येभ्यो यथाशीलं यथारुचि।

आत्मजाः परिदेह्यद्य विस्तृणीहि यशो भुवि॥ १५

atastvamṛṣimukhyebhyo yathāśīlaṃ yathāruci|

ātmajāḥ paridehyadya vistṛṇīhi yaśo bhuvi|| 15

अर्थ

अब तुम इन मरीचि आदि मुनिवरोंको इनके स्वभाव और रुचिके अनुसार अपनी कन्याएँ समर्पित करो और संसारमें अपना सुयश फैलाओ॥ १५॥✎ 309 1596

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #309 शब्दोंके बीचका स्थान: बाल,कमल-जैसे → बाल, कमल-जैसे
  • #1596 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: निष्कपट-भावसे → निष्कपटभावसे

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