साहं भगवतो नूनं वंचिता मायया दृढम्।
यत्त्वां विमुक्तिदं प्राप्य न मुमुक्षेय बन्धनात्॥ ५७
अवश्य ही मैं भगवान्की मायासे बहुत ठगी गयी, जो आप-जैसे मुक्तिदाता पतिदेवको पाकर भी मैंने संसार-बन्धनसे छूटनेकी इच्छा नहीं की॥ ५७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.23.57 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 352) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/23/57/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)