श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.23.4

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

स वै देवर्षिवर्यस्तां मानवीं समनुव्रताम्।

दैवाद्गरीयसः पत्युराशासानां महाशिषः॥ ४

sa vai devarṣivaryastāṃ mānavīṃ samanuvratām|

daivādgarīyasaḥ patyurāśāsānāṃ mahāśiṣaḥ|| 4

अर्थ

देवहूति समझती थी कि मेरे पतिदेव दैवसे भी बढ़कर हैं, इसलिये वह उनसे बड़ी-बड़ी आशाएँ रखकर उनकी सेवामें लगी रहती थी। इस प्रकार बहुत दिनोंतक अपना अनुवर्तन करनेवाली उस मनुपुत्रीको व्रतादिका पालन करनेसे दुर्बल हुई देख देवर्षिश्रेष्ठ कर्दमको दयावश कुछ खेद हुआ और उन्होंने उससे प्रेमगद्गद वाणीमें कहा॥ ४-५॥✎ 1595

यह अर्थ श्लोक 4–5 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1595 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: प्रेम-पूर्वक → प्रेमपूर्वक

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