श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.23.38

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

तस्मिन्‍नलुप्तमहिमा प्रिययानुरक्तो

विद्याधरीभिरुपचीर्णवपुर्विमाने ।

बभ्राज उत्कचकुमुद्गणवानपीच्य-

स्ताराभिरावृत इवोडुपतिर्नभःस्थः॥ ३८

tasminnaluptamahimā priyayānurakto

vidyādharībhirupacīrṇavapurvimāne |

babhrāja utkacakumudgaṇavānapīcya-

stārābhirāvṛta ivoḍupatirnabhaḥsthaḥ|| 38

अर्थ

उस समय अपनी प्रियाके प्रति अनुरक्त होनेपर भी कर्दमजीकी महिमा (मन और इन्द्रियोंपर प्रभुता) कम नहीं हुई। विद्याधरियाँ उनके शरीरकी सेवा कर रही थीं। खिले हुए कुमुदके फूलोंसे शृंगार करके अत्यन्त सुन्दर बने हुए वे विमानपर इस प्रकार शोभा पा रहे थे, मानो आकाशमें तारागणसे घिरे हुए चन्द्रदेव विराजमान हों॥ ३८॥

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