श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.23.36

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

स तां कृतमलस्नानां विभ्राजन्तीमपूर्ववत्।

आत्मनो बिभ्रतीं रूपं संवीतरुचिरस्तनीम्॥ ३६

sa tāṃ kṛtamalasnānāṃ vibhrājantīmapūrvavat|

ātmano bibhratīṃ rūpaṃ saṃvītarucirastanīm|| 36

अर्थ

शत्रुविजयी विदुर! जब कर्दमजीने देखा कि देवहूतिका शरीर स्नान करनेसे अत्यन्त निर्मल हो गया है, और विवाहकालसे पूर्व उसका जैसा रूप था, उसी रूपको पाकर वह अपूर्व शोभासे सम्पन्‍न हो गयी है। उसका सुन्दर वक्षःस्थल चोलीसे ढका हुआ है, हजारों विद्याधरियाँ उसकी सेवामें लगी हुई हैं तथा उसके शरीरपर बढ़िया-बढ़िया वस्त्र शोभा पा रहे हैं, तब उन्होंने बड़े प्रेमसे उसे विमानपर चढ़ाया॥ ३६-३७॥

यह अर्थ श्लोक 36–37 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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