श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.23.32

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

श्रोण्योरध्यस्तया काञ्च्या काञ्चन्या बहुरत्नया।

हारेण च महार्हेण रुचकेन च भूषितम्॥ ३२

śroṇyoradhyastayā kāñcyā kāñcanyā bahuratnayā|

hāreṇa ca mahārheṇa rucakena ca bhūṣitam|| 32

अर्थ

कमरमें पड़ी हुई सोनेकी रत्नजटित करधनीसे, बहुमूल्य मणियोंके हारसे और अंग-अंगमें लगे हुए कुङ्कुमादि मंगलद्रव्योंसे उसकी अपूर्व शोभा हो रही है ॥ ३२॥

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