॥ श्रीहरिः ॥
श्रोण्योरध्यस्तया काञ्च्या काञ्चन्या बहुरत्नया।
हारेण च महार्हेण रुचकेन च भूषितम्॥ ३२
śroṇyoradhyastayā kāñcyā kāñcanyā bahuratnayā|
hāreṇa ca mahārheṇa rucakena ca bhūṣitam|| 32
अर्थ
कमरमें पड़ी हुई सोनेकी रत्नजटित करधनीसे, बहुमूल्य मणियोंके हारसे और अंग-अंगमें लगे हुए कुङ्कुमादि मंगलद्रव्योंसे उसकी अपूर्व शोभा हो रही है ॥ ३२॥
श्रोण्योरध्यस्तया काञ्च्या काञ्चन्या बहुरत्नया।
हारेण च महार्हेण रुचकेन च भूषितम्॥ ३२
कमरमें पड़ी हुई सोनेकी रत्नजटित करधनीसे, बहुमूल्य मणियोंके हारसे और अंग-अंगमें लगे हुए कुङ्कुमादि मंगलद्रव्योंसे उसकी अपूर्व शोभा हो रही है ॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.23.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 349) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/23/32/