श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.23.2

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

विश्रम्भेणात्मशौचेन गौरवेण दमेन च।

शुश्रूषया सौहृदेन वाचा मधुरया च भोः॥ २

viśrambheṇātmaśaucena gauraveṇa damena ca|

śuśrūṣayā sauhṛdena vācā madhurayā ca bhoḥ|| 2

अर्थ

उसने काम-वासना, दम्भ, द्वेष, लोभ, पाप और मदका त्यागकर बड़ी सावधानी और लगनके साथ सेवामें तत्पर रहकर विश्वास, पवित्रता, गौरव, संयम, शुश्रूषा, प्रेम और मधुरभाषणादि गुणोंसे अपने परम तेजस्वी पतिदेवको सन्तुष्ट कर लिया॥ २-३॥✎ 1595

यह अर्थ श्लोक 2–3 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1595 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: प्रेम-पूर्वक → प्रेमपूर्वक

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