॥ श्रीहरिः ॥
प्रियव्रतोत्तानपदोः स्वसेयं दुहिता मम।
अन्विच्छति पतिं युक्तं वयः शीलगुणादिभिः॥ ९
priyavratottānapadoḥ svaseyaṃ duhitā mama|
anvicchati patiṃ yuktaṃ vayaḥ śīlaguṇādibhiḥ|| 9
अर्थ
यह मेरी कन्या—जो प्रियव्रत और उत्तानपादकी बहिन है—अवस्था, शील और गुण आदिमें अपने योग्य पतिको पानेकी इच्छा रखती है॥ ९॥
प्रियव्रतोत्तानपदोः स्वसेयं दुहिता मम।
अन्विच्छति पतिं युक्तं वयः शीलगुणादिभिः॥ ९
यह मेरी कन्या—जो प्रियव्रत और उत्तानपादकी बहिन है—अवस्था, शील और गुण आदिमें अपने योग्य पतिको पानेकी इच्छा रखती है॥ ९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.22.9 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 341) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/22/9/