दिष्ट्या मे भगवान् दृष्टो दुर्दर्शो योऽकृतात्मनाम्।
दिष्ट्या पादरजः स्पृष्टं शीर्ष्णा मे भवतः शिवम्॥ ६
diṣṭyā me bhagavān dṛṣṭo durdarśo yo'kṛtātmanām|
diṣṭyā pādarajaḥ spṛṣṭaṃ śīrṣṇā me bhavataḥ śivam|| 6
अर्थ
आपका दर्शन अजितेन्द्रिय पुरुषोंको बहुत दुर्लभ है; मेरा बड़ा भाग्य है जो मुझे आपका दर्शन हुआ और मैं आपके चरणोंकी मंगलमयी रज अपने सिरपर चढ़ा सका॥ ६॥
दिष्ट्या मे भगवान् दृष्टो दुर्दर्शो योऽकृतात्मनाम्।
दिष्ट्या पादरजः स्पृष्टं शीर्ष्णा मे भवतः शिवम्॥ ६
आपका दर्शन अजितेन्द्रिय पुरुषोंको बहुत दुर्लभ है; मेरा बड़ा भाग्य है जो मुझे आपका दर्शन हुआ और मैं आपके चरणोंकी मंगलमयी रज अपने सिरपर चढ़ा सका॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.22.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 341) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/22/6/