मनुजी निरन्तर समस्त प्राणियोंके हितमें लगे रहते थे। मुनियोंके पूछनेपर उन्होंने मनुष्योंके तथा समस्त वर्ण और आश्रमोंके अनेक प्रकारके मंगलमय धर्मोंका भी वर्णन किया (जो मनुसंहिताके रूपमें अब भी उपलब्ध है)॥ ३८॥
यः पृष्टो मुनिभिः प्राह धर्मान्नानाविधाञ्छुभान्।
नृणां वर्णाश्रमाणां च सर्वभूतहितः सदा॥ ३८
मनुजी निरन्तर समस्त प्राणियोंके हितमें लगे रहते थे। मुनियोंके पूछनेपर उन्होंने मनुष्योंके तथा समस्त वर्ण और आश्रमोंके अनेक प्रकारके मंगलमय धर्मोंका भी वर्णन किया (जो मनुसंहिताके रूपमें अब भी उपलब्ध है)॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.22.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 345) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/22/38/