इस प्रकार अपनी जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओं अथवा तीनों गुणोंको अभिभूत करके उन्होंने भगवान् वासुदेवके कथाप्रसंगमें अपने मन्वन्तरके इकहत्तर चतुर्युग पूरे कर दिये॥ ३६॥
स एवं स्वान्तरं निन्ये युगानामेकसप्ततिम्।
वासुदेवप्रसंगेन परिभूतगतित्रयः॥ ३६
इस प्रकार अपनी जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओं अथवा तीनों गुणोंको अभिभूत करके उन्होंने भगवान् वासुदेवके कथाप्रसंगमें अपने मन्वन्तरके इकहत्तर चतुर्युग पूरे कर दिये॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.22.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 344) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/22/36/