श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.22.36

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

स एवं स्वान्तरं निन्ये युगानामेकसप्ततिम्।

वासुदेवप्रसंगेन परिभूतगतित्रयः॥ ३६

sa evaṃ svāntaraṃ ninye yugānāmekasaptatim|

vāsudevaprasaṃgena paribhūtagatitrayaḥ|| 36

अर्थ

इस प्रकार अपनी जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओं अथवा तीनों गुणोंको अभिभूत करके उन्होंने भगवान् वासुदेवके कथाप्रसंगमें अपने मन्वन्तरके इकहत्तर चतुर्युग पूरे कर दिये॥ ३६॥

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