श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.22.33

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

सभार्यः सप्रजः कामान् बुभुजेऽन्याविरोधतः।

संगीयमानसत्कीर्तिः सस्त्रीभिः सुरगायकैः।

प्रत्यूषेष्वनुबद्धेन हृदा शृण्वन् हरेः कथाः॥ ३३

sabhāryaḥ saprajaḥ kāmān bubhuje'nyāvirodhataḥ|

saṃgīyamānasatkīrtiḥ sastrībhiḥ suragāyakaiḥ|

pratyūṣeṣvanubaddhena hṛdā śṛṇvan hareḥ kathāḥ|| 33

अर्थ

वहाँ अपनी भार्या और सन्ततिके सहित वे धर्म, अर्थ और मोक्षके अनुकूल भोगोंको भोगने लगे। प्रातःकाल होनेपर गन्धर्वगण अपनी स्त्रियोंके सहित उनका गुणगान करते थे; किन्तु मनुजी उसमें आसक्त न होकर प्रेमपूर्ण हृदयसे श्रीहरिकी कथाएँ ही सुना करते थे॥ ३३॥

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