श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.22.16

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

कामः स भूयान्‍नरदेव तेऽस्याः

पुत्र्याः समाम्नायविधौ प्रतीतः।

क एव ते तनयां नाद्रियेत

स्वयैव कान्त्या क्षिपतीमिव श्रियम्॥ १६

kāmaḥ sa bhūyānnaradeva te'syāḥ

putryāḥ samāmnāyavidhau pratītaḥ|

ka eva te tanayāṃ nādriyeta

svayaiva kāntyā kṣipatīmiva śriyam|| 16

अर्थ

श्रीकर्दम मुनिने कहा—ठीक है, मैं विवाह करना चाहता हूँ और आपकी कन्याका अभी किसीके साथ वाग्दान नहीं हुआ है, इसलिये हम दोनोंका सर्वश्रेष्ठ ब्राह्म* विधिसे विवाह होना उचित ही होगा॥ १५॥ राजन्! वेदोक्त विवाह-विधिमें प्रसिद्ध जो ‘गृभ्णामि ते’ इत्यादि मन्त्रोंमें बताया हुआ काम (संतानोत्पादनरूप मनोरथ) है, वह आपकी इस कन्याके साथ हमारा सम्बन्ध होनेसे सफल होगा। भला, जो अपनी अंगकान्तिसे आभूषणादिकी शोभाको भी तिरस्कृत कर रही है, आपकी उस कन्याका कौन आदर न करेगा?॥ १६॥

यह व्याख्या श्लोक 3.22.15 से 3.22.16 तककी एक साथ है।

टिप्पणियाँ

  1. *

    मनुस्मृतिमें आठ प्रकारके विवाहोंका उल्लेख पाया जाता है—(१) ब्राह्म, (२) दैव, (३) आर्ष, (४) प्राजापत्य, (५) आसुर, (६) गान्धर्व, (७) राक्षस और (८) पैशाच। इनके लक्षण वहीं तीसरे अध्यायमें देखने चाहिये। इनमें पहला सबसे श्रेष्ठ माना गया है। इसमें पिता योग्य वरको कन्याका दान करता है।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 342)

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