वीरवर! इधर मनुजी भी महारानी शतरूपाके साथ सुवर्णजटित रथपर सवार होकर तथा उसपर अपनी कन्याको भी बिठाकर पृथ्वीपर विचरते हुए, जो दिन भगवान्ने बताया था, उसी दिन शान्तिपरायण महर्षि कर्दमके उस आश्रमपर पहुँचे॥ ३६-३७॥✎ 301
यह अर्थ श्लोक 36–37 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।
मनुः स्यन्दनमास्थाय शातकौम्भपरिच्छदम्।
आरोप्य स्वां दुहितरं सभार्यः पर्यटन्महीम्॥ ३६
वीरवर! इधर मनुजी भी महारानी शतरूपाके साथ सुवर्णजटित रथपर सवार होकर तथा उसपर अपनी कन्याको भी बिठाकर पृथ्वीपर विचरते हुए, जो दिन भगवान्ने बताया था, उसी दिन शान्तिपरायण महर्षि कर्दमके उस आश्रमपर पहुँचे॥ ३६-३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.21.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 338) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/21/36/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)