श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.21.2

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

प्रियव्रतोत्तानपादौ सुतौ स्वायम्भुवस्य वै।

यथाधर्मं जुगुपतुः सप्तद्वीपवतीं महीम्॥ २

priyavratottānapādau sutau svāyambhuvasya vai|

yathādharmaṃ jugupatuḥ saptadvīpavatīṃ mahīm|| 2

अर्थ

ब्रह्मन्! आपने कहा था कि स्वायम्भुव मनुके पुत्र प्रियव्रत और उत्तानपादने सातों द्वीपोंवाली पृथ्वीका धर्मपूर्वक पालन किया था तथा उनकी पुत्री जो देवहूति नामसे विख्यात थी, कर्दमप्रजापतिको ब्याही गयी थी।॥ २-३॥

यह अर्थ श्लोक 2–3 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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