॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.21.11
विन्यस्तचरणाम्भोजमंसदेशे गरुत्मतः।
दृष्ट्वा खेऽवस्थितं वक्षःश्रियं कौस्तुभकन्धरम्॥ ११
vinyastacaraṇāmbhojamaṃsadeśe garutmataḥ|
dṛṣṭvā khe'vasthitaṃ vakṣaḥśriyaṃ kaustubhakandharam|| 11
अर्थ
उनके चरणकमल गरुडजीके कंधोंपर विराजमान थे, तथा वक्षःस्थलमें श्रीलक्ष्मीजी और कण्ठमें कौस्तुभमणि सुशोभित थी। प्रभुकी इस आकाशस्थित मनोहर मूर्तिका दर्शन करके कर्दमजीको बड़ा हर्ष हुआ, मानो उनकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो गयीं। उन्होंने सानन्द हृदयसे पृथ्वीपर सिर टेककर भगवान्को साष्टांग प्रणाम किया और फिर प्रेमप्रवण चित्तसे हाथ जोड़कर सुमधुर वाणीसे वे उनकी स्तुति करने लगे॥ ११-१२॥✎ 297 298