उससे जो बाल झड़कर गिरे, वे अहि हुए तथा उसके हाथ-पैर सिकोड़कर चलनेसे क्रूरस्वभाव सर्प और नाग हुए, जिनका शरीर फणरूपसे कंधेके पास बहुत फैला होता है॥ ४८॥
येऽहीयन्तामुतः केशा अहयस्तेऽङ्ग जज्ञिरे।
सर्पाः प्रसर्पतः क्रूरा नागा भोगोरुकन्धराः॥ ४८
उससे जो बाल झड़कर गिरे, वे अहि हुए तथा उसके हाथ-पैर सिकोड़कर चलनेसे क्रूरस्वभाव सर्प और नाग हुए, जिनका शरीर फणरूपसे कंधेके पास बहुत फैला होता है॥ ४८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.20.48 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 334) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/20/48/