श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.20.43

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

त आत्मसर्गं तं कायं पितरः प्रतिपेदिरे।

साध्येभ्यश्‍च पितृभ्यश्‍च कवयो यद्वितन्वते॥ ४३

ta ātmasargaṃ taṃ kāyaṃ pitaraḥ pratipedire|

sādhyebhyaśca pitṛbhyaśca kavayo yadvitanvate|| 43

अर्थ

पितरोंने अपनी उत्पत्तिके स्थान उस अदृश्य शरीरको ग्रहण कर लिया। इसीको लक्ष्यमें रखकर पण्डितजन श्राद्धादिके द्वारा पितर और साध्यगणोंको क्रमशः कव्य (पिण्ड) और हव्य अर्पण करते हैं॥ ४३॥

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