कुछ समय बाद जब उद्धवजी भगवान्के प्रेमधामसे उतरकर पुनः धीरे-धीरे संसारमें आये, तब अपने नेत्रोंको पोंछकर भगवल्लीलाओंका स्मरण हो आनेसे विस्मित हो विदुरजीसे इस प्रकार कहने लगे॥ ६॥
शनकैर्भगवल्लोकान्नृलोकं पुनरागतः।
विमृज्य नेत्रे विदुरं प्रत्याहोद्धव उत्स्मयन्॥ ६
कुछ समय बाद जब उद्धवजी भगवान्के प्रेमधामसे उतरकर पुनः धीरे-धीरे संसारमें आये, तब अपने नेत्रोंको पोंछकर भगवल्लीलाओंका स्मरण हो आनेसे विस्मित हो विदुरजीसे इस प्रकार कहने लगे॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.2.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 242) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/2/6/