॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.2.12
यन्मर्त्यलीलौपयिकं स्वयोग-
मायाबलं दर्शयता गृहीतम्।
विस्मापनं स्वस्य च सौभगर्द्धेः
परं पदं भूषणभूषणाङ्गम्॥ १२
yanmartyalīlaupayikaṃ svayoga-
māyābalaṃ darśayatā gṛhītam|
vismāpanaṃ svasya ca saubhagarddheḥ
paraṃ padaṃ bhūṣaṇabhūṣaṇāṅgam|| 12
अर्थ
भगवान्ने अपनी योगमायाका प्रभाव दिखानेके लिये मानवलीलाओंके योग्य जो दिव्य श्रीविग्रह प्रकट किया था, वह इतना सुन्दर था कि उसे देखकर सारा जगत् तो मोहित हो ही जाता था, वे स्वयं भी विस्मित हो जाते थे। सौभाग्य और सुन्दरताकी पराकाष्ठा थी उस रूपमें। उससे आभूषण (अंगोंके गहने) भी विभूषित हो जाते थे॥ १२॥✎ 191 192