श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.19.14

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

तदोजसा दैत्यमहाभटार्पितं

चकासदन्तः ख उदीर्णदीधिति।

चक्रेण चिच्छेद निशातनेमिना

हरिर्यथा तार्क्ष्यपतत्त्रमुज्झितम्॥ १४

tadojasā daityamahābhaṭārpitaṃ

cakāsadantaḥ kha udīrṇadīdhiti|

cakreṇa ciccheda niśātaneminā

hariryathā tārkṣyapatattramujjhitam|| 14

अर्थ

महाबली हिरण्याक्षका अत्यन्त वेगसे छोड़ा हुआ वह तेजस्वी त्रिशूल आकाशमें बड़ी तेजीसे चमकने लगा। तब भगवान्‌ने उसे अपनी तीखी धारवाले चक्रसे इस प्रकार काट डाला, जैसे इन्द्रने गरुडजीके छोड़े हुए तेजस्वी पंखको काट डाला था*॥ १४॥✎ 285

टिप्पणियाँ

  1. *

    एक बार गरुडजी अपनी माता विनताको सर्पोंकी माता कद्रूके दासीपनेसे मुक्त करनेके लिये देवताओंके पाससे अमृत छीन लाये थे। तब इन्द्रने उनके ऊपर अपना वज्र छोड़ा। इन्द्रका वज्र कभी व्यर्थ नहीं जाता, इसलिये उसका मान रखनेके लिये गरुडजीने अपना एक पर गिरा दिया। उसे उस वज्रने काट डाला।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 326)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #285 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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