॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.19.1
अथैकोनविंशोऽध्यायः
हिरण्याक्षवध
मैत्रेय उवाच
अवधार्य विरिञ्चस्य निर्व्यलीकामृतं वचः।
प्रहस्य प्रेमगर्भेण तदपाङ्गेन सोऽग्रहीत्॥ १
avadhārya viriñcasya nirvyalīkāmṛtaṃ vacaḥ|
prahasya premagarbheṇa tadapāṅgena so'grahīt|| 1
अर्थ
मैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! ब्रह्माजीके ये कपटरहित अमृतमय वचन सुनकर भगवान्ने उनके भोलेपनपर मुसकराकर अपने प्रेमपूर्ण कटाक्षके द्वारा उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली॥ १॥ फिर उन्होंने झपटकर अपने सामने निर्भय विचरते हुए शत्रुकी ठुड्डीपर गदा मारी। किन्तु हिरण्याक्षकी गदासे टकराकर वह गदा भगवान्के हाथसे छूट गयी और चक्कर काटती हुई जमीनपर गिरकर सुशोभित हुई। किंतु यह बड़ी अद्भुत-सी घटना हुई॥ २-३॥ उस समय शत्रुपर वार करनेका अच्छा अवसर पाकर भी हिरण्याक्षने उन्हें निरस्त्र देखकर युद्धधर्मका पालन करते हुए उनपर आक्रमण नहीं किया। उसने भगवान्का क्रोध बढ़ानेके लिये ही ऐसा किया था॥ ४॥ ✎ 281