श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.18.7

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

तं निःसरन्तं सलिलादनुद्रुतो

हिरण्यकेशो द्विरदं यथा झषः।

करालदंष्ट्रोऽशनिनिःस्वनोऽब्रवीद्

गतह्रियां किं त्वसतां विगर्हितम्॥ ७

taṃ niḥsarantaṃ salilādanudruto

hiraṇyakeśo dviradaṃ yathā jhaṣaḥ|

karāladaṃṣṭro'śaniniḥsvano'bravīd

gatahriyāṃ kiṃ tvasatāṃ vigarhitam|| 7

अर्थ

जब उसकी चुनौतीका कोई उत्तर न देकर वे जलसे बाहर आने लगे, तब ग्राह जैसे गजका पीछा करता है, उसी प्रकार पीले केश और तीखी दाढ़ोंवाले उस दैत्यने उनका पीछा किया तथा वज्रके समान कड़ककर वह कहने लगा, ‘तुझे भागनेमें लज्जा नहीं आती? सच है, असत् पुरुषोंके लिये कौन-सा काम न करनेयोग्य है?’॥ ७॥✎ 273

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #273 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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