श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.18.5

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

त्वयि संस्थिते गदया शीर्णशीर्ष-

ण्यस्मद्भुजच्युतया ये च तुभ्यम्।

बलिं हरन्त्यृषयो ये च देवाः

स्वयं सर्वे न भविष्यन्त्यमूलाः॥ ५

tvayi saṃsthite gadayā śīrṇaśīrṣa-

ṇyasmadbhujacyutayā ye ca tubhyam|

baliṃ harantyṛṣayo ye ca devāḥ

svayaṃ sarve na bhaviṣyantyamūlāḥ|| 5

अर्थ

जब मेरे हाथसे छूटी हुई गदाके प्रहारसे सिर फट जानेके कारण तू मर जायगा, तब तेरी आराधना करनेवाले जो देवता और ऋषि हैं, वे सब भी जड़ कटे हुए वृक्षोंकी भाँति स्वयं ही नष्ट हो जायँगे’॥ ५॥✎ 272

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #272 शब्दोंके बीचका स्थान: वराहभगवान् को → वराहभगवान्‌को

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