श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.18.23

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

आगस्कृद्भयकृद्दुष्कृदस्मद्राद्धवरोऽसुरः ।

अन्वेषन्‍नप्रतिरथो लोकानटति कण्टकः॥ २३

āgaskṛdbhayakṛdduṣkṛdasmadrāddhavaro'suraḥ |

anveṣannapratiratho lokānaṭati kaṇṭakaḥ|| 23

अर्थ

श्रीब्रह्माजीने कहा—देव! मुझसे वर पाकर यह दुष्ट दैत्य बड़ा प्रबल हो गया है। इस समय यह आपके चरणोंकी शरणमें रहनेवाले देवताओं, ब्राह्मणों, गौओं तथा अन्य निरपराध जीवोंको बहुत ही हानि पहुँचानेवाला, दुःखदायी और भयप्रद हो रहा है। इसकी जोड़का और कोई योद्धा नहीं है, इसलिये यह महाकण्टक अपना मुकाबला करनेवाले वीरकी खोजमें समस्त लोकोंमें घूम रहा है॥ २२-२३॥ ✎ 280

यह व्याख्या श्लोक 3.18.22 से 3.18.23 तककी एक साथ है।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #280 शब्दोंके बीचका स्थान: पाकरयह → पाकर यह

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