श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.18.2

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

ददर्श तत्राभिजितं धराधरं

प्रोन्‍नीयमानावनिमग्रदंष्ट्रया ।

मुष्णन्तमक्ष्णा स्वरुचोऽरुणश्रिया

जहास चाहो वनगोचरो मृगः॥ २

dadarśa tatrābhijitaṃ dharādharaṃ

pronnīyamānāvanimagradaṃṣṭrayā |

muṣṇantamakṣṇā svaruco'ruṇaśriyā

jahāsa cāho vanagocaro mṛgaḥ|| 2

अर्थ

वहाँ उसने विश्‍वविजयी वराहभगवान्‌को अपनी दाढ़ोंकी नोकपर पृथ्वीको ऊपरकी ओर ले जाते हुए देखा। वे अपने लाल-लाल चमकीले नेत्रोंसे उसके तेजको हरे लेते थे। उन्हें देखकर वह खिलखिलाकर हँस पड़ा और बोला, ‘अरे! यह जंगली पशु यहाँ जलमें कहाँसे आया’॥ २॥✎ 272

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #272 शब्दोंके बीचका स्थान: वराहभगवान् को → वराहभगवान्‌को

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