वह खीझकर लम्बी-लम्बी साँसें लेने लगा, उसकी इन्द्रियाँ क्रोधसे क्षुब्ध हो उठीं और उस दुष्ट दैत्यने बड़े वेगसे लपककर भगवान्पर गदाका प्रहार किया॥ १४॥✎ 276277278
सृजन्नमर्षितः श्वासान्मन्युप्रचलितेन्द्रियः।
आसाद्य तरसा दैत्यो गदयाभ्यहनद्धरिम्॥ १४
वह खीझकर लम्बी-लम्बी साँसें लेने लगा, उसकी इन्द्रियाँ क्रोधसे क्षुब्ध हो उठीं और उस दुष्ट दैत्यने बड़े वेगसे लपककर भगवान्पर गदाका प्रहार किया॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.18.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 322) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/18/14/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)