हाँ, हम रसातलवासियोंकी धरोहर चुराकर और लज्जा छोड़कर तेरी गदाके भयसे यहाँ भाग आये हैं। हममें ऐसी सामर्थ्य ही कहाँ कि तेरे-जैसे अद्वितीय वीरके सामने युद्धमें ठहर सकें। फिर भी हम जैसे-तैसे तेरे सामने खड़े हैं; तुझ-जैसे बलवानोंसे वैर बाँधकर हम जा भी कहाँ सकते हैं?॥ ११॥✎ 275
एते वयं न्यासहरा रसौकसां
गतह्रियो गदया द्रावितास्ते।
तिष्ठामहेऽथापि कथञ्चिदाजौ
स्थेयं क्व यामो बलिनोत्पाद्य वैरम्॥ ११
हाँ, हम रसातलवासियोंकी धरोहर चुराकर और लज्जा छोड़कर तेरी गदाके भयसे यहाँ भाग आये हैं। हममें ऐसी सामर्थ्य ही कहाँ कि तेरे-जैसे अद्वितीय वीरके सामने युद्धमें ठहर सकें। फिर भी हम जैसे-तैसे तेरे सामने खड़े हैं; तुझ-जैसे बलवानोंसे वैर बाँधकर हम जा भी कहाँ सकते हैं?॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.18.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 322) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/18/11/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#275 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने