श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.17.26

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

स वर्षपूगानुदधौ महाबल-

श्‍चरन्महोर्मीञ्छ्वसनेरितान्मुहुः ।

मौर्व्याभिजघ्ने गदया विभावरी-

मासेदिवांस्तात पुरीं प्रचेतसः॥ २६

sa varṣapūgānudadhau mahābala-

ścaranmahormīñchvasaneritānmuhuḥ |

maurvyābhijaghne gadayā vibhāvarī-

māsedivāṃstāta purīṃ pracetasaḥ|| 26

अर्थ

महाबली हिरण्याक्ष अनेक वर्षोंतक समुद्रमें ही घूमता और सामने किसी प्रतिपक्षीको न पाकर बार-बार वायुवेगसे उठी हुई उसकी प्रचण्ड तरंगोंपर ही अपनी लोहमयी गदाको आजमाता रहा। इस प्रकार घूमते-घूमते वह वरुणकी राजधानी विभावरीपुरीमें जा पहुँचा॥ २६॥

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