श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.17.2

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

दितिस्तु भर्तुरादेशादपत्यपरिशङ्किनी।

पूर्णे वर्षशते साध्वी पुत्रौ प्रसुषुवे यमौ॥ २

ditistu bharturādeśādapatyapariśaṅkinī|

pūrṇe varṣaśate sādhvī putrau prasuṣuve yamau|| 2

अर्थ

इधर दितिको अपने पतिदेवके कथनानुसार पुत्रोंकी ओरसे उपद्रवादिकी आशंका बनी रहती थी। इसलिये जब पूरे सौ वर्ष बीत गये, तब उस साध्वीने दो यमज (जुड़वे) पुत्र उत्पन्‍न किये॥ २॥

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