इसके पश्चात् वे मुनिगण अन्य साधनोंसे सिद्ध न होनेवाली स्वाभाविक अष्टसिद्धियोंसे सम्पन्न श्रीहरिकी स्तुति करने लगे—जो योगमार्गद्वारा मोक्षपदकी खोज करनेवाले पुरुषोंके लिये उनके ध्यानका विषय, अत्यन्त आदरणीय और नयनानन्दकी वृद्धि करनेवाला पुरुषरूप प्रकट करते हैं॥ ४५॥
पुंसां गतिं मृगयतामिह योगमार्गै-
र्ध्यानास्पदं बहु मतं नयनाभिरामम्।
पौंस्नं वपुर्दर्शयानमनन्यसिद्धै-
रौत्पत्तिकैः समगृणन् युतमष्टभोगैः॥ ४५
इसके पश्चात् वे मुनिगण अन्य साधनोंसे सिद्ध न होनेवाली स्वाभाविक अष्टसिद्धियोंसे सम्पन्न श्रीहरिकी स्तुति करने लगे—जो योगमार्गद्वारा मोक्षपदकी खोज करनेवाले पुरुषोंके लिये उनके ध्यानका विषय, अत्यन्त आदरणीय और नयनानन्दकी वृद्धि करनेवाला पुरुषरूप प्रकट करते हैं॥ ४५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.15.45 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 311) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/15/45/