॥ श्रीहरिः ॥
देवदेव जगद्धातर्लोकनाथशिखामणे२।
परेषामपरेषां त्वं भूतानामसि भाववित्॥ ४
devadeva jagaddhātarlokanāthaśikhāmaṇe|
pareṣāmapareṣāṃ tvaṃ bhūtānāmasi bhāvavit|| 4
अर्थ
देवाधिदेव! आप जगत्के रचयिता और समस्त लोकपालोंके मुकुटमणि हैं। आप छोटे-बड़े सभी जीवोंका भाव जानते हैं॥ ४॥
देवदेव जगद्धातर्लोकनाथशिखामणे।
परेषामपरेषां त्वं भूतानामसि भाववित्॥ ४
देवाधिदेव! आप जगत्के रचयिता और समस्त लोकपालोंके मुकुटमणि हैं। आप छोटे-बड़े सभी जीवोंका भाव जानते हैं॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.15.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 304) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/15/4/टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—शिरोमणे।
(मुद्रित पृष्ठ 304)