॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.15.39
कृत्स्नप्रसादसुमुखं स्पृहणीयधाम
स्नेहावलोककलया हृदि संस्पृशन्तम्।
श्यामे पृथावुरसि शोभितया श्रिया स्व-
श्चूडामणिं सुभगयन्तमिवात्मधिष्ण्यम्॥ ३९
kṛtsnaprasādasumukhaṃ spṛhaṇīyadhāma
snehāvalokakalayā hṛdi saṃspṛśantam|
śyāme pṛthāvurasi śobhitayā śriyā sva-
ścūḍāmaṇiṃ subhagayantamivātmadhiṣṇyam|| 39
अर्थ
प्रभु समस्त सद्गुणोंके आश्रय हैं, उनकी सौम्य मुखमुद्राको देखकर जान पड़ता था मानो वे सभीपर अनवरत कृपासुधाकी वर्षा कर रहे हैं। अपनी स्नेहमयी चितवनसे वे भक्तोंका हृदय स्पर्श कर रहे थे तथा उनके सुविशाल श्याम वक्षःस्थलपर स्वर्णरेखाके रूपमें जो साक्षात् लक्ष्मी विराजमान थीं, उनसे मानो वे समस्त दिव्यलोकोंके चूडामणि वैकुण्ठधामको सुशोभित कर रहे थे॥ ३९॥