श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.15.35

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

तेषामितीरितमुभाववधार्य घोरं

तं ब्रह्मदण्डमनिवारणमस्त्रपूगैः।

सद्यो हरेरनुचरावुरु बिभ्यतस्तत्

पादग्रहावपततामतिकातरेण ॥ ३५

teṣāmitīritamubhāvavadhārya ghoraṃ

taṃ brahmadaṇḍamanivāraṇamastrapūgaiḥ|

sadyo hareranucarāvuru bibhyatastat

pādagrahāvapatatāmatikātareṇa || 35

अर्थ

सनकादिके ये कठोर वचन सुनकर और ब्राह्मणोंके शापको किसी भी प्रकारके शस्त्रसमूहसे निवारण होनेयोग्य न जानकर श्रीहरिके वे दोनों पार्षद अत्यन्त दीनभावसे उनके चरण पकड़कर पृथ्वीपर लोट गये। वे जानते थे कि उनके स्वामी श्रीहरि भी ब्राह्मणोंसे बहुत डरते हैं ॥ ३५॥ फिर उन्होंने अत्यन्त आतुर होकर कहा—‘भगवन्! हम अवश्य अपराधी हैं; अतः आपने हमें जो दण्ड दिया है, वह उचित ही है और वह हमें मिलना ही चाहिये। हमने भगवान्‌का अभिप्राय न समझकर उनकी आज्ञाका उल्लंघन किया है। इससे हमें जो पाप लगा है, वह आपके दिये हुए दण्डसे सर्वथा धुल जायगा। किन्तु हमारी इस दुर्दशाका विचार करके यदि करुणावश आपको थोड़ा-सा भी अनुताप हो, तो ऐसी कृपा कीजिये कि जिससे उन अधमाधम योनियोंमें जानेपर भी हमें भगवत्स्मृतिको नष्ट करनेवाला मोह न प्राप्त हो॥ ३६॥

यह व्याख्या श्लोक 3.15.35 से 3.15.36 तककी एक साथ है।

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