॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.15.33
न ह्यन्तरं भगवतीह समस्तकुक्षा-
वात्मानमात्मनि नभो नभसीव धीराः।
पश्यन्ति यत्र युवयोः सुरलिङ्गिनोः किं
व्युत्पादितं ह्युदरभेदि भयं यतोऽस्य॥ ३३
na hyantaraṃ bhagavatīha samastakukṣā-
vātmānamātmani nabho nabhasīva dhīrāḥ|
paśyanti yatra yuvayoḥ suraliṅginoḥ kiṃ
vyutpāditaṃ hyudarabhedi bhayaṃ yato'sya|| 33
अर्थ
भगवान्के उदरमें यह सारा ब्रह्माण्ड स्थित है; इसलिये यहाँ रहनेवाले ज्ञानीजन सर्वात्मा श्रीहरिसे अपना कोई भेद नहीं देखते, बल्कि महाकाशमें घटाकाशकी भाँति उनमें अपना अन्तर्भाव देखते हैं। तुम तो देवरूपधारी हो; फिर भी तुम्हें ऐसा क्या दिखायी देता है, जिससे तुमने भगवान्के साथ कुछ भेदभावके कारण होनेवाले भयकी कल्पना कर ली॥ ३३॥✎ 263