श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.15.30

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

तान् वीक्ष्य वातरशनांश्‍चतुरः कुमारान्

वृद्धान्दशार्धवयसो विदितात्मतत्त्वान्।

वेत्रेण चास्खलयतामतदर्हणांस्तौ

तेजो३ विहस्य भगवत्प्रतिकूलशीलौ॥ ३०

tān vīkṣya vātaraśanāṃścaturaḥ kumārān

vṛddhāndaśārdhavayaso viditātmatattvān|

vetreṇa cāskhalayatāmatadarhaṇāṃstau

tejo vihasya bhagavatpratikūlaśīlau|| 30

अर्थ

वे चारों कुमार पूर्ण तत्त्वज्ञ थे तथा ब्रह्माकी सृष्टिमें आयुमें सबसे बड़े होनेपर भी देखनेमें पाँच वर्षके बालकोंसे जान पड़ते थे और दिगम्बरवृत्तिसे (नंग-धड़ंग) रहते थे। उन्हें इस प्रकार निःसंकोचरूपसे भीतर जाते देख उन द्वारपालोंने भगवान्‌के शील-स्वभावके विपरीत सनकादिके तेजकी हँसी उड़ाते हुए उन्हें बेंत अड़ाकर रोक दिया, यद्यपि वे ऐसे दुर्व्यवहारके योग्य नहीं थे॥ ३०॥✎ 1592

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—सम्यग्विहस्य।

    (मुद्रित पृष्ठ 308)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1592 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: बालकों-से → बालकोंसे

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