वे चारों कुमार पूर्ण तत्त्वज्ञ थे तथा ब्रह्माकी सृष्टिमें आयुमें सबसे बड़े होनेपर भी देखनेमें पाँच वर्षके बालकोंसे जान पड़ते थे और दिगम्बरवृत्तिसे (नंग-धड़ंग) रहते थे। उन्हें इस प्रकार निःसंकोचरूपसे भीतर जाते देख उन द्वारपालोंने भगवान्के शील-स्वभावके विपरीत सनकादिके तेजकी हँसी उड़ाते हुए उन्हें बेंत अड़ाकर रोक दिया, यद्यपि वे ऐसे दुर्व्यवहारके योग्य नहीं थे॥ ३०॥✎ 1592
तान् वीक्ष्य वातरशनांश्चतुरः कुमारान्
वृद्धान्दशार्धवयसो विदितात्मतत्त्वान्।
वेत्रेण चास्खलयतामतदर्हणांस्तौ
तेजो विहस्य भगवत्प्रतिकूलशीलौ॥ ३०
वे चारों कुमार पूर्ण तत्त्वज्ञ थे तथा ब्रह्माकी सृष्टिमें आयुमें सबसे बड़े होनेपर भी देखनेमें पाँच वर्षके बालकोंसे जान पड़ते थे और दिगम्बरवृत्तिसे (नंग-धड़ंग) रहते थे। उन्हें इस प्रकार निःसंकोचरूपसे भीतर जाते देख उन द्वारपालोंने भगवान्के शील-स्वभावके विपरीत सनकादिके तेजकी हँसी उड़ाते हुए उन्हें बेंत अड़ाकर रोक दिया, यद्यपि वे ऐसे दुर्व्यवहारके योग्य नहीं थे॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.15.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 308) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/15/30/