मैं भक्तवाञ्छाकल्पतरु, उग्र एवं रुद्ररूप महादेवको नमस्कार करती हूँ। वे सत्पुरुषोंके लिये कल्याणकारी एवं दण्ड देनेके भावसे रहित हैं, किन्तु दुष्टोंके लिये क्रोधमूर्ति दण्डपाणि हैं॥ ३४॥✎ 259
नमो रुद्राय महते देवायोग्राय मीढुषे।
शिवाय न्यस्तदण्डाय धृतदण्डाय मन्यवे॥ ३४
मैं भक्तवाञ्छाकल्पतरु, उग्र एवं रुद्ररूप महादेवको नमस्कार करती हूँ। वे सत्पुरुषोंके लिये कल्याणकारी एवं दण्ड देनेके भावसे रहित हैं, किन्तु दुष्टोंके लिये क्रोधमूर्ति दण्डपाणि हैं॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.14.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 302) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/14/34/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#259 शब्दोंके बीचका स्थान: भूतोंकेस्वामी → भूतोंके स्वामी