विदुरजी! दितिको भी उस निन्दित कर्मके कारण बड़ी लज्जा आयी और वह ब्रह्मर्षिके पास जा, सिर नीचा करके इस प्रकार कहने लगी॥ ३२॥
दितिस्तु व्रीडिता तेन कर्मावद्येन भारत।
उपसङ्गम्य विप्रर्षिमधोमुख्यभ्यभाषत॥ ३२
विदुरजी! दितिको भी उस निन्दित कर्मके कारण बड़ी लज्जा आयी और वह ब्रह्मर्षिके पास जा, सिर नीचा करके इस प्रकार कहने लगी॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.14.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 302) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/14/32/