तब कश्यपजीने उस निन्दित कर्ममें अपनी भार्याका बहुत आग्रह देख दैवको नमस्कार किया और एकान्तमें उसके साथ समागम किया॥ ३०॥
स विदित्वाथ भार्यायास्तं निर्बन्धं विकर्मणि।
नत्वा दिष्टाय रहसि तयाथोपविवेश ह॥ ३०
तब कश्यपजीने उस निन्दित कर्ममें अपनी भार्याका बहुत आग्रह देख दैवको नमस्कार किया और एकान्तमें उसके साथ समागम किया॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.14.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 301) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/14/30/