श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.14.28

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

ब्रह्मादयो यत्कृतसेतुपाला

यत्कारणं विश्‍वमिदं च माया।

आज्ञाकरी तस्य पिशाचचर्या

अहो विभूम्नश्‍चरितं विडम्बनम्॥ २८

brahmādayo yatkṛtasetupālā

yatkāraṇaṃ viśvamidaṃ ca māyā|

ājñākarī tasya piśācacaryā

aho vibhūmnaścaritaṃ viḍambanam|| 28

अर्थ

हमलोग तो क्या, ब्रह्मादि लोकपाल भी उन्हींकी बाँधी हुई धर्म-मर्यादाका पालन करते हैं; वे ही इस विश्‍वके अधिष्ठान हैं तथा यह माया भी उन्हींकी आज्ञाका अनुसरण करनेवाली है। ऐसे होकर भी वे प्रेतोंका-सा आचरण करते हैं। अहो! उन जगद‍्व्यापक प्रभुकी यह अद्भुत लीला कुछ समझमें नहीं आती’॥ २८॥

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