श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.13.49

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

तस्मिन् प्रसन्‍ने सकलाशिषां प्रभौ

किं दुर्लभं ताभिरलं लवात्मभिः।

अनन्यदृष्ट्या भजतां गुहाशयः

स्वयं विधत्ते स्वगतिं परः पराम्॥ ४९

tasmin prasanne sakalāśiṣāṃ prabhau

kiṃ durlabhaṃ tābhiralaṃ lavātmabhiḥ|

ananyadṛṣṭyā bhajatāṃ guhāśayaḥ

svayaṃ vidhatte svagatiṃ paraḥ parām|| 49

अर्थ

भगवान् तो सभी कामनाओंको पूर्ण करनेमें समर्थ हैं, उनके प्रसन्‍न होनेपर संसारमें क्या दुर्लभ है। किन्तु उन तुच्छ कामनाओंकी आवश्यकता ही क्या है? जो लोग उनका अनन्यभावसे भजन करते हैं, उन्हें तो वे अन्तर्यामी परमात्मा स्वयं अपना परम पद ही दे देते हैं॥ ४९॥✎ 257

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #257 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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