श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.13.25

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

निशम्य ते घर्घरितं स्वखेद-

क्षयिष्णु मायामयसूकरस्य।

जनस्तपःसत्यनिवासिनस्ते

त्रिभिः पवित्रैर्मुनयोऽगृणन् स्म॥ २५

niśamya te ghargharitaṃ svakheda-

kṣayiṣṇu māyāmayasūkarasya|

janastapaḥsatyanivāsinaste

tribhiḥ pavitrairmunayo'gṛṇan sma|| 25

अर्थ

अपना खेद दूर करनेवाली मायामय वराहभगवान्‌की घुरघुराहटको सुनकर वे जनलोक, तपलोक और सत्यलोकनिवासी मुनिगण तीनों वेदोंके परम पवित्र मन्त्रोंसे उनकी स्तुति करने लगे॥ २५॥✎ 254

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #254 शब्दोंके बीचका स्थान: वराहभगवान् की → वराहभगवान्‌की

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