श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.11.9

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

द्वादशार्धपलोन्मानं चतुर्भिश्‍चतुरङ्गुलैः।

स्वर्णमाषैः कृतच्छिद्रं यावत्प्रस्थजलप्लुतम्॥ ९

dvādaśārdhapalonmānaṃ caturbhiścaturaṅgulaiḥ|

svarṇamāṣaiḥ kṛtacchidraṃ yāvatprasthajalaplutam|| 9

अर्थ

छः पल ताँबेका एक ऐसा बरतन बनाया जाय जिसमें एक प्रस्थ जल आ सके और चार माशे सोनेकी चार अंगुल लंबी सलाई बनवाकर उसके द्वारा उस बरतनके पेंदेमें छेद करके उसे जलमें छोड़ दिया जाय। जितने समयमें एक प्रस्थ जल उस बरतनमें भर जाय, वह बरतन जलमें डूब जाय, उतने समयको एक ‘नाडिका’ कहते हैं॥ ९॥

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