॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.11.5
aṇurdvau paramāṇū syāttrasareṇustrayaḥ smṛtaḥ|
jālārkaraśmyavagataḥ khamevānupatannagāt || 5
अर्थ
दो परमाणु मिलकर एक ‘अणु’ होता है और तीन अणुओंके मिलनेसे एक ‘त्रसरेणु’ होता है, जो झरोखेमेंसे होकर आयी हुई सूर्यकी किरणोंके प्रकाशमें आकाशमें उड़ता देखा जाता है॥ ५॥ ऐसे तीन त्रसरेणुओंको पार करनेमें सूर्यको जितना समय लगता है, उसे ‘त्रुटि’ कहते हैं। इससे सौगुना काल ‘वेध’ कहलाता है और तीन वेधका एक ‘लव’ होता है॥ ६॥ तीन लवको एक ‘निमेष’ और तीन निमेषको एक ‘क्षण’ कहते हैं। पाँच क्षणकी एक ‘काष्ठा’ होती है और पन्द्रह काष्ठाका एक ‘लघु’॥ ७॥ पन्द्रह लघुकी एक ‘नाडिका’ (दण्ड) कही जाती है, दो नाडिकाका एक ‘मुहूर्त’ होता है और दिनके घटने-बढ़नेके अनुसार (दिन एवं रात्रिकी दोनों सन्धियोंके दो मुहूर्तोंको छोड़कर) छः या सात नाडिकाका एक ‘प्रहर’ होता है। यह ‘याम’ कहलाता है, जो मनुष्यके दिन या रातका चौथा भाग होता है॥ ८॥
टिप्पणियाँ
- ३
प्रा० पा०—अणू द्वौ द्व्यणुकः प्रोक्तः त्र०।
- ४
प्रा० पा०—जालाक्षार्करश्मिगतः।
- ५
प्रा० पा०—पतन्न गाम्। इसका उल्लेख श्रीधरस्वामीने भी किया है।