॥ श्रीहरिः ॥
एवंविधैरहोरात्रैः कालगत्योपलक्षितैः।
अपक्षितमिवास्यापि परमायुर्वयःशतम्॥ ३२
evaṃvidhairahorātraiḥ kālagatyopalakṣitaiḥ|
apakṣitamivāsyāpi paramāyurvayaḥśatam|| 32
अर्थ
इस प्रकार कालकी गतिसे एक-एक सहस्र चतुर्युगके रूपमें प्रतीत होनेवाले दिन-रातके हेर-फेरसे ब्रह्माजीकी सौ वर्षकी परमायु भी बीती हुई-सी दिखायी देती है॥ ३२॥✎ 246 247
एवंविधैरहोरात्रैः कालगत्योपलक्षितैः।
अपक्षितमिवास्यापि परमायुर्वयःशतम्॥ ३२
इस प्रकार कालकी गतिसे एक-एक सहस्र चतुर्युगके रूपमें प्रतीत होनेवाले दिन-रातके हेर-फेरसे ब्रह्माजीकी सौ वर्षकी परमायु भी बीती हुई-सी दिखायी देती है॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.11.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 285) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/11/32/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
- #246 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की
- #247 शब्दोंके बीचका स्थान: २४॥यह → २४॥ यह