यह ब्रह्माजीकी प्रतिदिनकी सृष्टि है, जिसमें तीनों लोकोंकी रचना होती है। उसमें अपने-अपने कर्मानुसार पशु-पक्षी, मनुष्य, पितर और देवताओंकी उत्पत्ति होती है॥ २५॥✎ 246247
एष दैनन्दिनः सर्गो ब्राह्मस्त्रैलोक्यवर्तनः।
तिर्यङ्नृपितृदेवानां सम्भवो यत्र कर्मभिः॥ २५
यह ब्रह्माजीकी प्रतिदिनकी सृष्टि है, जिसमें तीनों लोकोंकी रचना होती है। उसमें अपने-अपने कर्मानुसार पशु-पक्षी, मनुष्य, पितर और देवताओंकी उत्पत्ति होती है॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.11.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 285) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/11/25/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)