सत्ययुगके मनुष्योंमें धर्म अपने चारों चरणोंसे रहता है; फिर अन्य युगोंमें अधर्मकी वृद्धि होनेसे उसका एक-एक चरण क्षीण होता जाता है॥ २१॥✎ 246247
धर्मश्चतुष्पान्मनुजान् कृते समनुवर्तते।
स एवान्येष्वधर्मेण व्येति पादेन वर्धता॥ २१
सत्ययुगके मनुष्योंमें धर्म अपने चारों चरणोंसे रहता है; फिर अन्य युगोंमें अधर्मकी वृद्धि होनेसे उसका एक-एक चरण क्षीण होता जाता है॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.11.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 284) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/11/21/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)