श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.10.9

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

एतावाञ्जीवलोकस्य संस्थाभेदः समाहृतः।

धर्मस्य ह्यनिमित्तस्य विपाकः परमेष्ठ्यसौ॥ ९

etāvāñjīvalokasya saṃsthābhedaḥ samāhṛtaḥ|

dharmasya hyanimittasya vipākaḥ parameṣṭhyasau|| 9

अर्थ

जीवोंके भोगस्थानके रूपमें इन्हीं तीन लोकोंका शास्त्रोंमें वर्णन हुआ है; जो निष्काम कर्म करनेवाले हैं, उन्हें महः, तपः, जनः और सत्यलोकरूप ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है॥ ९॥

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